मैं 11वीं में पढ़ता था। रोज स्कूल जाता था लेकिन
स्कूल के दोस्तों से ज्यादा घुली- मिला नहीं था।
मेरे स्कूल में 9वीं क्लास में एक लड़की पढ़ती थी,
जो रोज किसी न किसी बहाने से मेरी क्लास में
आती थी। कभी अपनी कॉपी चेक करवाने,
तो कभी बुक हाथ में लिए हमारे टीचर से कुछ पूछने के
बहाने क्लासरूम में आ जाती थी। आते-जाते, मुझे
हल्का सा मुस्कुराते हुए देखती थी। एक-दो बार उसने
ऐसा ही किया तो मैंने उस पर गौर करना शुरू किया।
अगली बार क्लासरूम में वो आई और चिर परिचित
अंदाज में मुस्कुराते हुए मेरे पास खड़ी हो गई। उसने
मुझसे कहा, 'आपके पास नाइंथ क्लास के नोट्स है?
आप मुझे दे सकते हैं? उस दिन हमारी पहली बातचीत
के बाद से वो मुझे पसंद आने लगी थी।
अगली एक-दो मुलाकातों के बाद मुझे उससे प्यार
हो गया। जिस दिन भी स्कूल में उससे बात
होती थी, उस रात वो मेरे सपने तक में आ जाती थी।
ऐसा कई बार हुआ। इसके करीब एक महीने बाद उसने
मुझे एक लेटर दिया, जिसके आखिर में लिखा था 'आई
लव यू तुम्हारी कोमल।' इस पर मैंने भी उसे एक लेटर
लिखा जो मेरा पहला प्रेम पत्र था। उस समय सुबह
घने कोहरे के बीच हम एक साथ स्कूल जाया करते थे
और रास्ते भर बातें करते रहते। स्कूल पहुंचकर हम बगीचे
में फूलों पर चमकती ओस की बूंदों से खेला करते थे। अब
ये ठंड तुमसे जुड़ी यादों की गर्माहट बढ़ा रही है।
वह मेरे सामने खड़ी थी, आसमान से
उतरी किसी परी की तरह। मेरी नजरों को जैसे उसने
कैद कर लिया था। मैं उसे घूरे जा रहा था। अचानक
हाथ से चाय का ग्लास छूटने पर मैं सकपकाया और
एक नजर उसने भी मुझे देखा। चाय की दुकान वाले से
ग्लास के पैसे काट लेने की बात कहते हुए मै वापस उसे
देखने लगा। बड़ी खूबसूरत सुबह थी वह। अपने पापा के
साथ होटल से जलेबी लेने आई थी वह। कुछ पल बाद
वो अपने पापा के साथ चली गई पर मैं उस होटल में
कुछ उधार कर आया था। शायद उसके
ख्यालों का उधार था
इसलिए अब रोज वहां जाने लगा था।
रोज वो आती। मैं उसे जी भर के देखता और दोनों के
बीच एक अनकही बातचीत होती पर मैं
कभी अपनी आंखों की जुबां को लफ्ज न दे सका।
पढ़ाई पूरी हो गई और मैं एक कॉलेज में प्रिंसिपल बन
गया। एक रोज उसी कॉलेज में हाथों में मेहंदी लगाए
उसी परी को एक बच्चे को ले जाते देखा।दिल ने
कहा, एक बार हिम्मत करके अपने दिल की बात उसे
बता ही देनी चाहिए। लेकिन हिचक भी थी। मैं उसे
एकटक देखे जा रहा था। वो मुझसे धीरे-धीरे दूर
जा रही थी। मैं तेजी से उसकी ओर भागा, उसके कुछ
दूर पहुंचने से पहले ही वह पीछे मुड़ी। मैं वहीं रुक गया।
वो मेरे पास आई। मेरी सांसे तेज हो गई थीं। वह
बोली, 'तुम्हें प्यार का इज़हार करना नहीं आता।
दिल जोड़ना नहीं आता। शायद गिलास तोड़ने वाले
कभी दिल टूटने की आवाज नहीं सुन पाते हैं। उन्हें
दिल का टूटना भी गिलास टूटने जैसा ही लगता है।'
इतना कहकर वो चल दी। थोड़ा चलकर फिर मुड़ी।
बोली, काश! तुम्हें प्यार का इज़हार करना आता।
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